Wednesday, September 3, 2014

" जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम , दोऊ हाथ उलीचिए यह सज्जन का काम |"

Good morning dear friends.
सुप्रभात दोस्तों ।
09 04 2014

कलम से____

आज कबीर का दोहा याद हो आया जो हमने बचपन में पढ़ा था । कल बड़ी सार्थक चर्चाएं फेसबुक पर देखने को मिलीं। उसी सोच आगे बढ़ाते हुए आज मुझे कहना है कि :-

कबीर ने बाह्य आडम्बरो का विरोध किया है | उन्होंने हिंदू -मुसलमान दोनों के बाह्य दिखावे का विरोध किया है | आत्म ज्ञान पर बल दिया है | प्रेम ,सदभाव परोपकार ,दया आदि पर बल दिया है | वे कर्म करना आवश्यक मानते है | वे चाहते हैं कि जिसके पास धन -दौलत है ,वह समाज के उस वर्ग की सहायता करे जिसके पास साधन नही हैं |

कहा है ------- " जो जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम , दोऊ हाथ उलीचिए यह सज्जन का काम |"

अपनी बात :

आजकल फेसबुक पर
नालेज शेयरिंग का दौर चल रहा है
मेरा मित्र आशीष बहुत सुंदर ज्ञान बाँट रहा है
कभी इधर उधर भटक जाता है
राह सही पकड
फिर सीधा हो जाता है।

मेरे जेहन में एक प्रश्न आता है
सच है, जो वह बतलाता है
कहाँ से प्रमाण लाएगा
अपनी बात साबित कैसे कर पाएगा
दुश्मनों ने नेस्तनाबूद कर दिए थे
जेहाद के नाम पर
न जाने कितने घर मंदिर उजाड दिए थे
सभ्यता के निशान मिट जो गए हैं
कैसे बनेगें ?

अब नहीं बन सकेंगे
दरार जो आगई है कैसे पटेगी
मिलजुल कर अगर हम न चलेगें।

एक झुक जाए
समस्या हल हो जाएगी
वरना तो तस ही तस ही रह जाएगी
सियासी अखाड़ा बन गया है
खेल बना बनाया बिगड़ गया है।

मानवता के क्रमिक विकास की कहानी - आदमी में परिवर्तन की निशानी को सहज कर रखने की जिम्मेदारी हम सभी की बनती है।

सियासत को सभंल कर चलना होगा आपसी भाईचारा और सहिष्णुता को बढ़ावा देना होगा।चुनावी महौल बनाते वक्त हमें इन बातों का ध्यान रखना होगा।

//surendrapalsingh//

http://spsinghamaur.blogspot.in/

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