Friday, July 14, 2017




A book:-
"एक थे चन्द्रचूड़ सिंह"
Written by Mr.S.P Singh, President, Zephyr Limited.
Price:Rs.125/= only
Published By
Zephyr Entertainment Private Limited,
B-13A, Institutional Area,
Sector-62, Noida (U.P.)-201301
www.zephyr.co.in
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Mail Id: dharmendra.kumar@zephyr.co.in/spsingh@zephyr.co.in
Phone: +91 120 7945000
लेखन के क्षेत्र में अब श्री एस पी सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। इन्होंने अब तक अँगरेजी और हिन्दी में अनेक धारावाहिकों, कहानियों की रचना की है। चाहे दो धड़कते दिलों में मुहब्बत का सैलाब हो या देश अथवा समाज के विभिन्न वर्गों में एकता स्थापित करने की बात हो, इनकी लेखनी से ये विषय बच नहीं सके हैं। देश की आज़ादी और अँगरेजी हुकूमत से पहले और अँगरेजी हुकूमत के दौरान भी भारत छोटे छोटे राज्यों और रियासतों में बँटा था। इन राज्यों और रियासतों पर राजाओं और रजवाड़ों की हुकूमत चलती थी। रजवाड़े अपने तौर तरीक़ों से शासन चलाते थे। प्रस्तुत धारावाहिक “एक थे चंद्रचूड़ सिंह” में कांकर, उत्तर प्रदेश के स्थानीय राजपरिवार का विशद वर्णन है। उनके रहन सहन, शासन शैली, प्रजा के प्रति आत्मीयता, के दर्शन इस पुस्तक में बहुत ही सुंदर ढंग से मिलते हैं। श्री एस पी सिंह के लेखन में मुझे एक विशेषता बार बार परिलक्षित होती है और वह है दो विपरीत समुदायों में एकता स्थापित करने का भरपूर प्रयास जो कि वर्तमान समय में आवश्यक प्रतीत होता है। कुँवर अनिरुद्ध का विवाह भोपाल की रहने वाली मुस्लिम शाही परिवार सबा से होता है और दोनों परिवार बिना किसी हिचक इस रिश्ते को क़ुबूल करते हैं और दोनों परिवारों में मेलमिलाप का सुखद वातावरण बनता है। 

स्वयं चंद्रचूड़ सिंह की तीन रानियाँ हैं जिनमें एक हैं गौहर बेगम। इन तीनों रानियों में पारिवारिक प्रेम और सामंजस्य एक मिसाल है। कहीं भी इस बात की झलक नहीं मिलती कि यह प्रेम थोपा गया है। तीनों में वैचारिक समानता के धरातल पर पारिवारिक निर्णय लिए जाते हैं। इसके साथ ही राजपरिवार की राजनीतिक आकांक्षा के दर्शन भी हमें इस पुस्तक में मिलते हैं। कुँवर अनिरुद्ध के लिए राजनीति विलासिता का साधन नहीं है बल्कि प्रजा के प्रति समर्पण है। कुँवर का राजसी रहन सहन सार्वजनिक हित के काम में बाधक नहीं बनता है। इस धारावाहिक में हमें सत्तर के दशक की राजनीतिक हलचल भी सुनाई देती है जो नवोदित पीढ़ी के लिए जानकारी का साधन है। 

पुस्तक का विधिवत् अध्ययन हमें सच्चे प्रेम, प्रजा वात्सल्य, एक दूसरे के प्रति आदर और सम्मान के पाश में इतना बाँधे रखता है कि पाठक पुस्तक का ओर-छोर पढ़े बिना रह नहीं सकता। कहानी में अविरल प्रवाह है जो समूची कथा को सुपाठ्य और बोधगम्य बनाने में सक्षम है। आशा है कि पाठक श्री एस पी सिंह की इस नवीन रचना का आनंद उठाएँगे। सच तो यह है कि यह पुस्तक उनके व्यापक अनुभव और इतिहास के गहन अध्ययन तथा अथक परिश्रम का फल है। किसी भी रचना की सफलता तो उसके पाठकों पर निर्भर है और पाठक इस कृति को अपने स्नेह से वंचित नहीं करेंगे।

राम शरण सिंह

Sunday, July 9, 2017

My meeting with ......God





My meeting with........God.

मेरी यह मुलाक़ात उससे कुछ अजीबोगरीब से हालात में हुई थी। 

मैं तो Max Super speciality Hospital के CCU की बेड पर Dr Manoj Kumar और उनकी टीम की देखभाल में था। मेरे चारों ओर केरल प्रदेश की वह देवियाँ थी जिनके आपस में मलयालम के वार्तालाप को सुन कर ही Gods Own Country विचारों में समा जाता है। कितने सेवा भाव से घर से हज़ारों मील दूर रह कर भी मरीज़ों की देखभाल करतीं हैं। इस उधेड़बुन में कब गहन निद्रा में एक black hole में चला गया पता ही न लगा। Cardrone injection का असर था जो मुझे heart episode के बाद administer किया गया था। blood pressure था कि गिरता ही जा रहा था और  pulse 165-170 के बीच थी। doctors के कहने के अनुसार यह एक emergency थी और कुछ भी हो सकता था पर वो sure थे कि 5-7घन्टो में situation control हो जायेगी। तभी तो उन्होंने मेरे ऑफिस की Zephyr टीम के लोगों के सुझाव Mendata या Escorts में शिफ्ट करने को नहीं माना था।

चारों तरफ अंधकार था। दूर दूर तक कहीं भी लाइट नज़र नहीँ आ रही थी। यह एक लंबी यात्रा थीपर मैं भी मानसिक रूप से इस यात्रा के लिये तैयार था। मुझे ज्ञात था कि अबकी बार third attack पड़ा है और यह मुश्किल पैदा करने वाला हो सकता। पर मैं टूटा नहीँ था मुझे  दृढ़ विश्वाश था कि अबकी बार भी पहले की तरह हॉस्पिटल से घर वापस जाना ही है। आख़िरकार दूर बहुत दूर tunnel के दूसरे मुहाने पर प्रकाश की किरण दिखाई दी।

मैंजिसका कोई बज़ूद नहीँ थान नामन धर्मन देशन अपना शहर सब कुछ अजीब सा था। चारों ओर सुंदर प्राकृतिक छटा बिखरी हुई थी।मनमोहक वातावरण और मनोहारी पर्वत श्रंखला और नदी में कल कल करता जल प्रवाह ने मेरा ध्यान उस ओर खींचा और मैं नदी किनारे बैठ गया। मानव जैसे जीवधारी नहीँ दिख रहे थे। भिन्न भिन्न प्रकार की रंग बिरंगी चिड़ियाँ इस डाल से उस डाल पर आ जा रहीं थीं। ऐसे पक्षी मैंने पहले कभी नहीँ देखे थे। सब कुछ अजीब सा लग रहा था।

इधर उधर घूमने के बाद मैं एक जगह शांति से बैठ गया।कब आँख लग गई पता ही न लगा। स्वप्न सरीखी स्थित में मैंने एक प्रकाश पुंज को अपनी ओर आते हुए महसूस किया। प्रकाश पुंज मेरे क़रीब आके रुक गया। उसने मेरे सिर के पास आकर आशीर्वाद दिया और फिर मुझे निद्रा से उठाया। उस प्रकाश पुंज का भी कोई रूप या आकर नहीँ था। उस प्रकाश पुंज से बिशिस्ट प्रकार की ध्वनि हुई जो मेरी समझ में नहीँ आ रही थी।मैं किंकर्तव्यविमूढ़म स्थित में था। प्रकाश पुंज ने मेरी दिक्कत को महसूस किया और कहा इस समस्या का शीघ्र ही कोई निदान निकल आएगा।

कुछ देर बाद जो ध्वनि आ रही थी और भी तेज हुई और फिर कुछ अजीब सा हुआ और तब वह आवाज़ मुझे सुनाई पड़ने लगी। उस प्रकाश पुंज ने मेरा नई जगह आने पर स्वागत किया और बताया कि हम दोनों की भाषा भिन्न होने के कारण  वार्तालाप नहीँ हो पा रहा था पर वह दिक्कत अब दूर करली गई है और अब हम  आपस में वार्तालाप कर सकते हैं। मुझे लगा कि यह भी कोई कंप्यूटर में सॉफ्टवेयर जैसीproblem रही होगी जो अब ठीक कर ली गई है।

प्रकाश पुंज ने मुझ से बात करते हुए कहा कि वही इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के रचयिता और कर्ता धर्ता हैं।उस ब्रह्मांड के जिसका न कोई छोर हैन ही कोई परिध।अनंत सूर्य और उनके चारों ओर उनके उपग्रह चक्कर लगाते रहते हैं। इनमें से कइयों के ऊपर जीवन है और कइयों के ऊपर नहीँ। यहाँ रहने वालों में भूतकाल से ही प्रतिस्पर्धा चली आ रही है।इन सब के बीच यह कहने में जिझक नहीँ की पृथ्वी पर मानव जीवन मेरी सर्वोत्तम कृति है।कालांतर में सभ्यताओं का विकास हुआ और मानव धर्मरंगभेदवर्णों में बटने लगा। यहीँ से शरुआत हुई आपस में स्पर्धा की और विकास की। धीरे धीरे समाज में आमूलचूल परिवर्तन आया और कुछ लोग विकसित हो गए और कुछ इस दौड़ में पिछड़ गये। अभी यह विकास की दौड़ और जोर पकड़ेगी मानव सत्ता दूसरे ग्रहों और ब्रह्मांडो तक पहुचेंगी। अंततः यही विकास विनाश का कारण बनेगा।

जब मानव इस भीड़ भाड़ से उकताने लगता है या घबराने लगता है तो उसे मेरी याद आती है और वह मेरे शरणागत हो जाता है। यह मानवीय प्रकृति है कि सुख में अपने में मग्न और दुःख में अपने मन को समझाने के लिये कभी यहाँ तो कभी वहाँ भटका करता है।

इन सभी ब्रह्मांडो की रचना मेरी ही की हुई है और  इनके जीवन काल की समाप्ति पर मेरे ही आदेश पर विघटन होकर समाप्त हो जाते हैं। प्रकाश पुंज के कथनानुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड में जो भी घटना घटित होती है वह उनके आदेशों के अनुरूप ही होती है। उन्हें पल पल की खबर रहती है।

पृथ्वी के मानव का विकास एक अदभुत रूप में हुआ है। इसके विकास को देख दूसरे ग्रहों के लोंगो में उत्कंठा बनी रहती है। अपने ज्ञान वर्धन के लिये वे कभी कभी तुम्हारी पृथ्वी पर भी जाते हैं। पृथ्वी के लोगों में इनको लेकर कई बार बहस भी हुई है परुंत अभी तक कोई ठोस विचार नहीँ बन पाया है।

अब तो पृथ्वी ले लोग भी अपने चाँदमंगल और भी अनेक ग्रहों के आसपास तक पहुँच गये हैं। अभी यह यात्रा उन्हें और आगे ले जाएगी।

तुम यहाँ आये हो वह भी मेरे आदेश पर।तुम स्वयं को धन्य समझो कि यहाँ तक आ पाये हो और तुम्हें यह अवसर प्राप्त हुआ। तुम्हारी और हमारी आपस में बातचीत हो पा रही है।अभी तुम्हें लंबी अवधि तक वहीँ रहना पड़ेगा क्योंकि अभी तुम्हें बहुत कार्य करने हैं।  इसलिए तुम अब वापस जाओ और कुछ समय के लिए पृथ्वी पर ही रहो।

मैंने कहा जैसा आपका आदेशपरुंत मुझे आपसे दो प्रश्न पूछने हैं कि मुझे यहाँ न तो राम दिखे और न ही दिखे कृष्णन ही दिखे रहीम और न ही यीशुन ही दिखे बुद्ध और न ही दिखे महावीर यह सब युग पुरुष कहाँ रहते हैं जो दिख नहीँ रहे हैं और दूसरा कि  आजकल हमारी पृथ्वी पर यह द्वेषभाव और यह आपस में समुदायों और विभिन्न धर्मिक आस्थाओं के अनुयायियों के बीच यह मारा मारी और घृणा का वातावरण क्यों है?

पृथ्वी पर जो भी घटित हो रहा है मुझे उसका पूरा ज्ञान है। मैं ही शिव हूँमैं ही रामकृष्णरहीमखुदायीशुबद्ध और महावीर हूँ। यह श्रष्टि मेरी ही बनाई हुई है और जो भी वहाँ या यहाँ घटित होता है वह भी मेरी मर्ज़ी के अनुसार। मैं ही निर्माता हूँ और मैं ही पालनहार भी हूँ। मैं किसी से नहीँ कहता कि तुम मेरी पूजा अर्चना करो। यह तो मानव ही है जब अपनी परेशानियों से घबराता है तो मेरी शरण में आता है और जब उसके भीतर के तनाव समाप्त हो जाते हैं तो वह पुनः अपनी पूर्व स्थित में चला जाता है। तुम्हारे दूसरे प्रश्न के उत्तर मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि मैंने कभी नहीँ चाहा था कि एक मानव दूसरे के खून का प्यासा हो पर तुम्हारी पृथ्वी पर लोग धर्मवर्गरंग भेद जैसे विषयों में उलझ के रह गए हैं। कुछ लोग धर्म का उपयोग अपनी अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए कर रहे हैं अधार्मिक और पाप कर रहे हैं। विभिन्न देशों  के  बीच तनाव बना हुआ है। समाज विभिन्न वर्गों में बटा हुआ है।यही धार्मिक उन्माद और एक देश का दूसरे देश के प्रति दुर्भावना रखना ही पृथ्वी के विनाश का कारण बनेंगे। पर अभी वह समय आने में देर है। इसका विश्वाश रखो कि जो हो रहा है वह होके ही रहेगा आखिर जो सर्जन हुआ है उसका विनाश होना भी एक प्राकृतिक क्रिया के अनुकूल है। फिलहाल तुम् वापस जाओ। तुम्हारे चाहने वाले और परिजन सभी चिंतित हो रहे हैं।मुझे उनकी प्रार्थनाओं का भी ध्यान करना है।जाओ वत्स प्रसन्न रहो।

जब मेरी निद्रा टूटी तो मैंने स्वयं को हॉस्पिटल की बेड पर पाया। नहीँ समझ आ रहा था यह एक स्वप्न था या किसी परलोक की कथा।पर जो भी था अच्छा था।

धन्यवाद।



Prowesses of Mr. S.P.Singh

Prowesses of Mr. S.P.Singh



At the age of seventy, if someone starts writing, it is neither for making a career as a writer and surely nor for making money; Mr. SP Singh, after enjoying a successful professional stint spanning more than 50 years in government and private sector, has taken up writing to highlight tourist potential of India to the world community based on his personal travelling experiences. A blend of modernity and human ambitions, agonies and ecstasies, detailing of historical sites and mix of cultural values find apt place in his writing.

His first work “Indian Tiger Caged in the Cupboard" appeared some time back which surprised many book lovers both within the country and abroad as he touched upon the life style of a principality in Mankapur, a sleepy township of eastern Uttar Pradesh, India.

 His second novel, "Agony of Migration" depicted the problems faced by farming community especially in State of Punjab. It’s beautiful narrative of life of erstwhile and of modern times of Punjab.  The head of the family, Ranjeet Singh, with his clever moves could turn around the fortunes of the family and eventually became a big corporate house. Story line has usual massala of lovelorn life of the young boy of the Sikh family who fell in love with a hot Tamilian girl.

His recent work and the third in the series, "Touristique" has been published in which he has once again successfully portrayed tourist potential of a little known place Rann of Kutch and Bhuj City in Gujarat, famous tourist triangle involving Agra, Jaipur and Delhi, besides a thorough exposure of life and death in the internationally famous and the oldest city of human civilization Varanasi through a loving story of fulfilment of ambitions and career growth in international Corporate life.

Mr. S.P.Singh has also contributed in Hindi and his following work has duly been published:

1 Rinni Khnna Ki Kahani: A story of a young women who makes her way to the Corporate world with her hard work and becomes one of the leading Industrialist of US.

2 Main Uski Khwahish Hun: A story based on the current turmoil in Jammu and Kashmir centring with issue of terror and resettlement of displaced Kashmiri Pandits.

3 Ek The Chandrachudh Singh: A story woven around Awadh and region around Lucknow gives a view of Old Kingdoms and ambition of a young Royal Prince to become a successful Member of Parliament to meet aspirations of the people of his constituency.

And also about six short story books.

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What are you waiting for, grab your copy and get submerged in these gripping and engrossing romantic fictions.......to get your copies so that you can enjoy good and clean reading material. 

Monday, November 21, 2016

रिंनी खन्ना की कहानी


हमने रिंनी खन्ना की कहानी के दो खण्ड देखे और तीसरा खण्ड सुधी पाठकों के हाथ में है। सबसे पहले तो मैं यह कहना समीचीन समझता हूँ कि रचनाकार श्री एस पी सिंह ने अपनी कहानी की मुख्य पात्र रिंनी खन्ना के व्यक्तित्व को कहीं झुकने नहीं दिया और ज़िंदगी के हर मोड़ पर रिंनी का चरित्र किसी की दया का मोहताज नहीं बनता क्योंकि ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जीना रिंनी की आदत है। दूसरा पहलू यह प्रतीत होता है कि रिंनी ऐसे व्यक्तित्व की धनी है कि वह लोगों को अपने अनुसार ढाल लेती है। यह रचनाकार की विशेषता ही है कि अपने इस बृहद धारावाहिक के माध्यम से श्री एस पी सिंह ने रिंनी के चरित्र को अनुकरणीय बना दिया। मन में यह उत्कंठा बनी रहती है कि रिंनी अब आगे क्या करेगी|
रिंनी ज़हीन है, तक़दीर और दौलत दोनों की स्वामिनी है। ऐसा लगता है कि परिस्थितियाँ स्वयमेव सज-धज कर उसके समक्ष उपस्थित हो रही हैं और रिंनी का स्वागत कर रही हैं। उसमें वह गुण है कि पत्थर को अपने स्पर्श से पारस बना देती है। वावजूद इन सबके, रिंनी में एक ऐसा स्त्रीत्व विराजमान है जो ऊँची उड़ान तो भरता है परंतु धरातल को नहीं भूलता। वह भी ईंट-पत्थर और लोहे से बने घर को बच्चों की किलकारियों से आबाद करने को लालायित है और इस स्वप्न को पूरा भी करती है। इस तीसरे खण्ड में रिंनी गार्हस्थ्य जीवन में प्रवेश करती है और उसका भरपूर आनंद उठाती है| परिवार के सभी सदस्यों के मध्य सौहार्द बनाये रखने की अहम् कड़ी है|
मित्रो, जीवन सदैव सपाट, सरल, ऋजु और निष्कंटक नहीं होता। जीवन को सर्पिल मार्गों से हो कर भी गुज़रना पड़ता है। फलस्वरूप, अनजाने हमारे समक्ष ऐसा दुर्विपाक उपस्थित हो जाता है जहाँ हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, हमारे वश में कुछ रह नहीं जाता, हम पूर्णतया दैवाधीन हो जाते हैं। ऐसे में जीवन की कश्ती को लहरों की मर्ज़ी पर छोड़ देने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाता। रिंनी भी प्रकृति के इस क्रूर परंतु अटल नियम से परे नहीं है। आतंकवाद रिंनी की हँसती-खेलती दुनिया का उपहास करते हुए अपने कराल पंजों से ऐसा प्रहार करता है कि उसके जीवन का प्रासाद देखते-देखते उसकी आँखों के सामने ढह जाता है। यह वही आतंकवाद है जिसकी न कोई सीमा है और न कोई देश। यह हर रोज चुन-चुन कर मानवता का नाश कर रहा है। रिंनी अपने पति रवि और बेटे को खो देती है। उसके सामने दीर्घ जीवन का नैराश्य मुहँ बाये खड़ा है| परंतु वह अपना धैर्य बनाये रखती है|
समग्ररूप में इस धारावाहिक में हमें जीवन की किशोरावस्था से लेकर परिपक्वता तक पहुँचने के कई आयाम परिलक्षित होते हैं। श्री एस पी सिंह की हरेक रचना में देश की सांस्कृतिक विरासत को पर्याप्त स्थान मिलता है और रिंनी खन्ना की कहानी का तीसरा खण्ड भी इसका अपवाद नहीं है। रचना में कोणार्क और खजुराहो का वर्णन बड़ा ही जीवंत बन पड़ा है। पाठक को कोणार्क से खजुराहो की लंबी यात्रा तो करनी पड़ती है परंतु इस यात्रा में उसे कोई क्लांति और श्रांति की अनुभूति नहीं होती|
इसप्रकार हम गर्व से कह सकते हैं कि तीन खण्डों  में प्रकाशित यह धारावाहिक देश की विरासत से परिचित तो कराता ही है, साथ-साथ हम भारतीयों की व्यापारिक सूझबूझ का परिचय देते हुए विदेश में भी सफलता की कहानी सुना जाता है।

धन्यवाद:                                                                      राम शरण सिंह

बेंगलूरु

दिनांक : 08-11-2016

Monday, August 15, 2016

ये दुनियाँ अगर मिल भी जाये तो क्या है

मॉल से लौटते हुए एक भूखे व्यत्क्ति को पैसे मांगते हुए देख क्या लिया, सारा नशा उत्सव का उतर गया, हक़ीक़त से ऐसे मुकावला हो गया......

बहुत मना लिया उत्सव
   देखा मेला भी
खाई नमकीन मिठाई भी
चल अपनी दुनियाँ में
   आ अब लौट चलें
देखें दुनियाँ में अपनी क्या है
ऐसी दुनियाँ वैसी दुनियाँ
   मिल भी जाये तो क्या है
तो क्या है......

मुफ़लिसी, बीमारी
कीड़े मकौड़े वाली दुनियाँ
   भूख से परेशान बिफरते
रोते हुओं इंसानो की दुनियाँ
फटे-चीकट कपड़ों की दुनियाँ
   बिकते हों शरीर जहाँ
बिखरते टूटते सपने जहाँ
   बुझते दिए, श्वासों की दुनियाँ
ऐसी दुनियाँ वैसी दुनियाँ
ये दुनियाँ मिल भी जाये 
तो क्या है ........

स्वप्न सजोये बहुत
दीप आशा के जलाए बहुत
   कहा था तुम्ही ने तो यह
पोंछ दूँगा आँसू हर आँख के मैं
   भूल गए हो कहा था जो तुमने
ग़रीब नेताओं को फ़टेहाल देखा 
रातों रात बनते अमीर देखा 
   लौट के नहीँ आते हैं
रोज़ नई गाड़ी में जो दिखते हैं
वादा कर भूल जो जाते हैं
   करे भरोसा कोई कैसे उन पर
मर जाये कोई तब भी आयें न नज़र
ऐसी दुनियाँ वैसी दुनियाँ
   नसीब से मिल भी जाये 
तो क्या है.............

Monday, August 8, 2016

तुम् भी चुप हम भी चुप




तुम भी चुप, हम भी चुप
यह कैसी ख़ामोशी है
गर्म जोशी के निशां थे जहां  
अब खामोशी क्यों बनी रहती है...

जीने वालों से है ये ज़िन्दगी
सो जो गये उन्हें सो जाने दो
रात बहुत अभी है बाकी
चराग़ों को जलना है उन्हें जलने दो...

अँधेरे हैं भहुत गहन
तो क्या सूरज न निकले
जिसको आना है क्या वह न आये
जाने वाले को किसने रोका है
जाना चाहे जो उसे जाने भी दो, 
जो जाये, बख़ुशी जाये...

Sunday, August 7, 2016

रिनीं खन्ना की कहानी उसकी जुबानी..


 रिनीं खन्ना की कहानी उसकी जुबानी..

आज कुछ मीठा न भी हो चलेगा पर कुछ हट के हो जाये......... एक नया प्रयोग।

एक लघु कथा।

रिंनी खन्ना, जी सही सुना आपने मेरा नाम रिंनी खन्ना ही है। आप से कुछ रोज़ पहले मुलाक़ात हुई थी तब मैं आपको समझ नहीँ पाई थी। अब बहुत बेहतर समझती हूँ मैं आपको......

यह कहानी एक रिंनी खन्ना की नहीँ वरन् उन तमाम रिंनी खन्ना जैसी लड़कियों की है जो आज समाज में अपनी जगह बनाते हुए एक आम ज़िंदगी जीना चाहतीं हैं।

रिंनी ने एक विज्ञापन क्या दिया, शांत तालाब में जैसे सैलाब आ गया। किसी ने कुछ कहा किसी ने कुछ। आखिर उस विज्ञापन में ऐसा क्या था जिस पर इतना बबाल हो गया।

रिंनी ने बस यही तो विज्ञापन दिया था कि एक अदद मर्द की ज़रूरत है जो उसके साथ रह सके।

समाज सेवी संस्थाओं ने रिंनी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया।कुछ मनचलों को यह विज्ञापन बहुत पसंद आया। कुछ बुजुर्गवार ने यह कह कर दुत्कार दिया कि हाय यह कैसा ज़माना आ गया है। मसलन जिसके मुँह जो आया कहा।

रिंनी इन सब से बेख़बर अपनी ही दुनियाँ में ज़िंदगी जी रही थी। उसकी सोच सबसे निराली जो थी।उसका मानना था कि जिंदगी जब तक अपने हिसाब से न जी जाये तो ऐसी ज़िंदगी का क्या मतलब? खासतौर पर किसी का ग़ुलाम बन कर रहना कम से कम उसके लिये मुनासिब नहीँ था।

बहरहाल, रिंनी ने यह तय कर लिया, कि वह किसी की नहीँ सुनेगी और अपने मन की कर के रहेगी। लिहाज़ा उसने उन आवेदनों पर गौर करना शुरू किया जिन्होंने उसके विज्ञापन के उत्तर में आये थे।

आवेदनों के गठ्ठर से उसने कुछ का चुनाव किया और एक एक कर आवेदकों को विभिन्न जगहों पर बुला कर interview की प्रक्रिया शुरू की।

उन आवेदकों में जो पहले नंम्बर पर आया उन सज्जन का नाम था, सुनील। सुनील को उसने Hotel Park में लंच पर बुलाया और एक लंबी चर्चा करी। पहले तो अपने बारे में बताया कि उसने आईआईएम( अहमदाबाद) से MBA किया है और वह एक multinational company में senior post पर है और उसका annual package लगभग 24 लाख रूपये है और निकट भविष्य में वह अमेरिका जा कर वहीँ settle होने की सोच रही है।

रिंनी ने पूछा, "आपका क्या विचार है?"

क्रमशः।
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Comments
Ram Saran Singh सर आगे की प्रतीक्षा रहेगी
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Rajan Varma भाई सॉ शुरुआत अच्छी अौर रोचक मध्य की अोर इशारा कर रही है; ये आपकी धारावाहिक अौर मुझे संशोधन/त्रुटि-दोष सुधार का कोई हक नहीं- पर मुझे लगता है कि advertisement का शार्ट-फ़ार्म 'ad' होना चाहिये न कि 'add'. It is giving a different meaning.
क्षमा चाहता हूँ इस दुस्साहस के लिये-
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S.p. Singh सुझाव मान्य है अभी correct कर रहा हूँ।
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Rajan Varma S.p. Singh जी सर- धन्यवाद
LikeReply6 hrs
S.p. Singh मैं अपनी ग़लती स्वीकारता हूँ। जब यह कहानी लिख रहा था तब दिमाग़ की घँटी नहीँ बजी और हिंदी का उचित शब्द भी ध्यान में नहीँ आ पाया इसलिए वह शब्द बस यूँ ही निकल गया। वैसे भी मैं words को spell करने में ग़लती कर ही जाता हूँ।

आपकी मदद समय समय पर मिलती रही है और आगे भी मिलेगी यही आशा रहेगी।...See More
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Rajan Varma S.p. Singh सर आपका लेख/धारावाहिक अत्रुटीय हो अौर सही अर्थ दर्शाये- बस यही सब मंशा है हम मित्रजनों की; शुभ इतवार
UnlikeReply16 hrs
Pankaj Pande कैमरे की आंख से कुछ नहीं छुपता। वाह!
UnlikeReply14 hrs
S.p. Singh
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Pooran Chandra Juyal Good morning sirji.
Bahut sunder.
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S.p. Singh सुप्रभात
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S.p. Singh
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Sanjay Bedi Waiting sir
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Neelesh B Sokey शुरूआत अच्छी है। धारावाहिक hit होगा ।
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S.p. Singh उम्मीद तो यही है
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S.p. Singh
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Rp Singh सुन्दर
UnlikeReply11 hr
S.p. Singh धन्यवाद आप अपना आशीर्वाद दे रहे हैं तो इसे मैं और आगे तक ले जाऊँगा। कृपया साथ बने रहें, सुझाव कोई भी हो वह भी पोस्ट करें, जिससे सुधार किया जा सके।
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